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बाल विकास के सिद्धान्त - the concept of child development Bal Vikas and Shiksha shastra in Hindi.

 

बाल विकास के सिद्धान्त  - the concept of child development  Bal Vikas and Shiksha shastra in Hindi. 


बाल विकास के सिद्धान्त  - the concept of child development  Bal Vikas and Shiksha shastra in Hindi.

बाल विकास के सिद्धान्त  - the concept of child development  Bal Vikas and Shiksha Shastra in Hindi. 



 

बाल विकास और शिक्षाशास्त्र नोट्स – बाल विकास के सिद्धान्त  पाठ-क्रम

1.

बाल विकास के सिद्धान्त  - concept of child development 

2.

बाल विकास के सिद्धान्त - bal vikas and shiksha shastra in hindi

3.

वैयक्तिक अन्तर का सिद्धान्त - Theory of individual difference in Hindi

4.

विकास क्रम की एकरूपता - Uniformity of development sequence in Hindi

5.

वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नहीं रहती - The rate of speed of growth and development is not same in Hindi

6.

विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है- Development moves from general to special In Hindi

7.

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त - Theory of correlation In Hindi.

8.

एकीकरण का सिद्धान्त - Theory of integration In Hindi

9.

विकास की भविष्यवाणी की जा सकती है - Growth can be predicted In Hindi.

10.

विकास की दिशा का सिद्धान्त - Theory of development direction In Hindi.

11.

विकास लम्बवत सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है - The growth is vertical rather than vertical in Hindi

12.

वृद्धि और विकास की क्रिया वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम है - The action of growth and development is the combined result of inheritance and environment in Hindi

13.

बाल विकास से सम्बन्धित अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त (Bal Vikas and Shiksha Shastra in Hindi)

14.

पुनर्बलन सिद्धान्त - Reinforcement principle in Hindi

15.

सामाजिक अधिगम सिद्धान्त - Social learning theory in Hindi

16.

वृद्धि तथा विकास को प्रभावित करने वाले कारक - Factors affecting growth and development in Hindi

17.

वंशानुक्रम – Inheritance in Hindi

18.

वातावरण - an atmosphere in Hindi

19.

पोषण - Nutrition in Hindi

 

सामान्य बालक अभिनधि तथा विकास की दिशा में आपसर होता हुआ एक प्राणी है। समय के साथ उसमें बहुत से गुणात्मक तथा परिमाणात्मक परिवर्तन आते है जिनका सम्मिलित नाम विकास कहलाता है। घोरे-धीरे उसकी लाई, भार, क्रियात्मक क्रियाओं, प्रत्यक्षीकरण, संवेगात्मक नियन्त्रण, सामाजिक समायोजन, साधा योग्यता इत्यादि का एक नियमित प्रतिरूप के अनुसार अभिवृद्धि तथा विकास होता रहता है। इस विकास का ज्ञान शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य को अधिक प्रभावशाली बनाने में काफी सहायक हो किसी निश्चित आयु के आलको के पाठ्यक्रम सम्बन्धी क्रियाओं को नियोजित करते समय शिक्षक को यह जानना आवश्यक हो जाता है कि उस आयु बालकों में सामान्यतः किस प्रकार की शारीरिक व मानसिक क्षमता है, उन्हें किस प्रकार की सामाजिक क्रियाओं, में लगाया जा सकता है तथा वे अपने संवेगों पर कितना नियन्त्रण रख सकते हैं। शिक्षक को उस आयु के सामान्य बालकों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता के स्तर का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वह उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करके उन्हें अपेक्षित दिशा प्रदान कर सके।

 

बाल विकास के सिद्धान्त - bal vikas and shiksha shastra in hindi

निरन्तरता का सिद्धान्त - Principle of continuity :- इस सिद्धान्त के अनुसार विकास एक न रुकने बाली प्रक्रिया है। माँ के गर्भ से ही यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और मृत्युपर्यन्त चलती  रहती है। एक छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व के सभी पक्षों - शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी निरन्तरता के गुण के कारण भली-भाँति सम्पन्न होता रहता है।

वैयक्तिक अन्तर का सिद्धान्त - Theory of individual difference in Hindi :-

इस सिद्धान्त के अनुसार बालकों का विकास और वृद्धि उनकी अपनी वैयक्तिकता के अनुरूप होती है। वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते है और इसी कारण उनमें पर्याप्त विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। कोई भी एक बालक वृद्धि और विकास की दृष्टि से किसी अन्य बालक के समरूप नहीं होता। विकास के इसी सिद्धान्त के कारण कोई बालक अत्यन्त मेधानी, कोई बालक सामान्य तथा कोई बालक पिछड़ा या मन्द होता है।

 

विकास क्रम की एकरूपता - Uniformity of development sequence in Hindi

 :-  यह सिद्धान्त बताता है कि विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकासक्रम में कुछ एकरूपता के दर्शन होते हैं। इस क्रम में एक ही जाति विशेष के सभी सदस्यों में कुछ एक जैसी विशेषताएँ देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की ओर से प्रारम्भ होती है। इसी तरह बालकों के गत्यात्मक और भाषायी विकास में भी एक निश्चित प्रतिमान और क्रम के दर्शन किए जा सकते हैं।

 

वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नहीं रहती - The rate of speed of growth and development is not same in Hindi :-

विकास की प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती तो है, किन्तु इस प्रक्रिया में विकास की गति हमेशा एक जैसी नहीं होती। शैशवावस्था के शुरु के वर्षों में यह गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षों में यह मन्द पड़ जाती है। पुन किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस गति में तेजी से वृद्धि होती है, परन्तु यह अधिक समय तक नहीं बनी रहती। इस प्रकार वृद्धि और विकास की गति में उतार-चढ़ाव आते ही रहते है। किसी भी अवस्था में यह एक जैसी नहीं रह पाती।

 

विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है- Development moves from general to special In Hindi

:- विकास और वृद्धि की सभी दिशाओं में विशिष्ट क्रियाओं से पहले उनके सामान्य रूप के दर्शन होते हैं। उदाहरण के लिए अपने हाथों से कुछ चीज पकड़ने से पहले बालक इधर से उधर यूँ ही हाथ मारने या फैलाने की चेष्टा करता है। इसी तरह शुरू में एक नवजात शिशु के रोने और चिल्लाने में उसके सभी अंग-प्रत्यंग भाग लेते हैं, परन्तु बाद में वृद्धि और विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह क्रियाएँ उसकी आँखों और वाक्तन्त्र तक सीमित हो जाती हैं। भाषा विकास में भी बालक विशेष शब्दों से पहले सामान्य शब्द ही सीखता है। पहले वह सभी व्यक्तियों को पापा कहकर ही सम्बोधित करता है, इसके पश्चात् ही वह केवल अपने पिता को पापा कहकर सम्बोधित करना सीखता है।

 

 

 

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त - Theory of correlation In Hindi.

 :-  विकास के सभी आयाम, जैसे-शारीरिक,मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित हैं। इनमें से किसी भी एक आयाम में होने वाला विकास अन्य सभी आयामों में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए जिन, बच्चों में औसत से अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से भी काफी आगे बढ़े हुए पाए जाते हैं। दूसरी ओर, एक क्षेत्र में पाई जाने वाली न्यूनता दूसरे क्षेत्र में हो रही प्रगति में बाधक सिद्ध होती है। यही कारण है कि शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते हैं।


एकीकरण का सिद्धान्त - Theory of integration In Hindi

विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त का पालन करती है। इसके अनुसार, बालक पहले सम्पूर्ण अंग
को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है। इसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बढ़ते हुए विशेष प्रतिक्रियाओं तथा चेष्टाओं को इकट्ठे रूप
और फिर हाथ एवं अंगुलियों को एक साथ चलाना सीखता है। में प्रयोग में लाना सीखता है। उदाहरण के लिए, एक बालक पहले पूरे हाथ को, फिर अंगुलियों को और फिर हाथ एवं अंगुलियों को एक साथ चलाना सीखता है। 

विकास की भविष्यवाणी की जा सकती है - Growth can be predicted In Hindi.

:- किसी बालक में उसकी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रखकर उसके आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है। उदाहरण के लिए, एक बालक की कलाई की हड्डियों का एक्स किरणों से लिया जाने वाला चित्र यह बता सकता है कि उसका आकार-प्रकार आगे जाकर किस प्रकार का होगा। इसी तरह बालक की इस समय की मानसिक योग्यताओं के ज्ञान के सहारे उसके आगे के मानसिक विकास के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

 

विकास की दिशा का सिद्धान्त - Theory of development direction In Hindi

 :- इस सिद्धान्त के अनुसार, विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है। विकास की प्रक्रिया की यह दिशा व्यक्ति के वंशानुगत एवं वातावरणजन्य कारकों से प्रभावित होती है। इसके अनुसार बालक सबसे पहले अपने सिर और भुजाओं की गति पर नियन्त्रण करना सीखता है और उसके बाद फिर टाँगों को। इसके बाद ही वह अच्छी तरह बिना सहारे के खड़ा होना और चलना सीखता है।

 

विकास लम्बवत सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है - The growth is vertical rather than vertical in Hindi

 

बालक का विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है। वह एक-सी गति से सीधा चलकर विकास को प्राप्त नहीं होता, बल्कि बढ़ते हुए पीछे हटकर अपने विकास को परिपक्व और स्थायी बनाते हुए वर्तुलाकार आकृति की तरह आगे बढ़ता है। किसी एक अवस्था में वह तेजी से आगे बढ़ते हुए उसी गति से आगे नहीं जाता, बल्कि अपनी विकास की गति को धीमा करते हुए वर्षों में विश्राम लेता हुआ प्रतीत होता है ताकि प्राप्त वृद्धि और विकास को स्थाई रूप दिया जा सके। यह सब करने के पश्चात् ही वह आगामी वर्षों में फिर कुछ आगे बढ़ने की चेष्टा कर सकता है।

 

वृद्धि और विकास की क्रिया वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम है - The action of growth and development is the combined result of inheritance and environment in Hindi
 

:-  बालक की वृद्धि और विकास को किसी स्तर पर वंशानुक्रम और वातावरण की संयुक्त देन माना जाता है। दूसरे शब्दों में, वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में वंशानुक्रम जहाँ आधार का कार्य करता है वहाँ वातावरण इस आधार पर बनाए जाने वाले व्यक्तित्व सम्बन्धी भवन के लिए आवश्यक सामग्री एवं वातावरण जुटाने में सहयोग देता है। अतः वृद्धि और विकास की प्रक्रियाओं में इन दोनों को समान महत्त्व दिया जाना आवश्यक हो जाता है।

बाल विकास से सम्बन्धित अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त (bal vikas and shiksha shastra in hindi)

बाल विकास से सम्बन्धित अन्य सिद्धान्त निम्न हैं

पुनर्बलन सिद्धान्त - Reinforcement principle in hindi

·         इस सिद्धान्त के प्रतिपादक डोलार्ड और मिलर (John Dollard Neal Miller) हैं। इनके अनुसार बच्चे का जैसे-जैसे विकास होता है, अधिगम करता जाता है। इन्होंने बाल्यावस्था के अनुभवों को वयस्क व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में स्वीकार किया है।

 

·         इन्होंने अचेतन कारकों के अतिरिक्त चिन्ता और अधिगमित भय को व्यक्तित्व गतिशीलता में बहुत अधिक महत्त्व दिया है। इनके अनुसार भोजन, पानी, ऑक्सीजन और ताप कुछ अर्जित आवश्यकताएँ हैं परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अर्जित व्यवहार पूर्णत पर्याप्त नहीं होता है|

 

·         बालक को अधिक जटिल व्यवहार का अधिगम इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करना होता है उदाहरण लिए, नवजात शिशु का स्तनपान से सम्बन्धित अर्जित व्यवहार उसकी भोजन की आवश्यकता के लिए अधिक समय तक पर्याप्त नहीं होता है, उसे भूख की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कुछ अधिक स्तनपान के जटिल व्यवहारों को सीखना होता है।

 

·         इनके अनुसार अधिगम के चार महत्त्वपूर्ण अवयव हैंअन्तर्नोद (अभिप्रेरणा), संकेत (उद्दीपक), प्रत्युत्तर (स्वयं का व्यवहार) तथा पुनर्बलन (पुरस्कार)।

 

 

सामाजिक अधिगम सिद्धान्त - Social learning theory in Hindi

·         इस सिद्धान्त के प्रतिपादक बन्दूरा और वाल्टर्स ने सामाजिक अधिगम के महत्त्व की पुष्टि अनेक प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर की है, बन्दूरा ने एक प्रयोग में बच्चों को एक फिल्म दिखाई जिसमें एक वयस्क व्यक्ति के व्यवहार को प्रदर्शित किया गया था।

 

·         फिल्म के तीन भाग थे प्रत्येक बच्चे को केवल एक प्रकार की फिल्म दिखाई गई।

 

·         पहली फिल्म में फिल्म का हीरो आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करता था और इस व्यवहार के लिए उसे दण्ड दिया जाता था।

 

·         दूसरी फिल्म में हीरो आक्रामक व्यवहार करता था और अपने इस आक्रामक व्यवहार के लिए पुरस्कृत होता था।

 

·         तीसरा फिल्म में आक्रामक व्यवहार के लिए हीरो को न ही पुरस्कृत किया जाता था और न ही दण्डित किया जाता था फिल्म को प्रत्येक बच्चे को दिखाने के बाद प्रत्येक बच्चे को उन्हीं परिस्थितियों में रखा गया जिन परिस्थितियों से सम्बन्धित उन्हें फिल्म दिखाई गई थीं।

 

·         इन परिस्थितियों में रखकर बच्चों के व्यवहार निरीक्षण कर यह देखा गया है कि बच्चों ने उस व्यवहार का अनुकरण अपेक्षाकृत कम किया जो हीरो के आक्रामक व्यवहार और दण्ड से सम्बन्धित था। सामाजिक अधिगम सिद्धान्त में व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारकों में केवल वातावरण सम्बन्धी कारकों को ही महत्त्व दिया है, वंशानुक्रम कारकों को कोई महत्त्व नहीं दिया गया है।

 

 

वृद्धि तथा विकास को प्रभावित करने वाले कारक - Factors affecting growth and development in hindi

विकास क्रम को प्रभावित करने वाले अनेक तत्व होते है। इन तत्वों द्वारा विकास को गति प्राप्त होती है तथा ये तत्व विकास को नियन्त्रित भी रखते है। विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व निम्नलिखित है

वंशानुक्रम – Inheritance in Hindi

·         बालक का विकास बंशानुक्रम (Heredity) में उपलब्ध गुण एवं क्षमताओं पर निर्भर रहता है। गर्भधारण करने के साथ ही बालक में पैतृक कोषों का विकास आरम्भ हो जाता है तथा यहीं से बालक की बुद्धि एवं विकास की सीमाएं सुनिश्चित हो जाती है।

 

·         ये पैतृक गुण पीड़ी-दर-पीड़ी हस्तान्तरित होते रहते है। बालक के कद, आकृति बुद्धि, चरित्र आदि को भी वंशानुक्रम सम्बन्धी विशेषताएँ प्रभावित करती है।

वातावरण - atmosphere in hindi

·         वातावरण भी बालक के विकास को प्रभावित करने वाला मुख्य तत्व है वातावरण के प्रभाव स्वरूप व्यक्ति में अनेक विशेषताओं का विकास होता है।

 

·         शैशवावस्या से ही वातावरण बालक को प्रभावित करने लगता है। बालक के जीवन दर्शन एवं शैली का स्वरूप, स्कूल, समाज, पड़ोस तथा परिवार के प्रभाव के परिणामस्वरूप ही स्पष्ट होता है।

 

·         धीरे-धीरे बालक उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है जिसमें वह अपनी योग्यताओं एवं क्षमता के अनुसार वातावरण पर प्रभाव डालने में सक्षम होता है।

 

बुद्धि - wisdom in hindi

मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के आधार पर निश्चित किया है कि कुशाग्रबुद्धि वाले बालकों का शारीरिक एवं मानसिक विकास मन्दबुद्धि वालों की अपेक्षा अधिक तेज गति से होता है।

 

कुशाग्रबुद्धि बालक शोध बोलने एवं चलने लगते हैं। प्रतिभाशाली बालक 11 माह में, सामान्य बुद्धि बालक 16 माह की आयु में और मन्द बुद्धि बालक 24 माह की आयु में बोलना सीखता है।

 

पोषण - Nutrition in hindi

 यह वृद्धि तथा विकास का महत्त्वपूर्ण घटक होता है। बालकों के विकास के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। यदि हमारे खान-पान में उपयुक्त पोषक तत्वों की कमी होगी तो वृद्धि एवं विकास इससे प्रभावित होगा। सन् 1956 में वाटरलू ने अफ्रीका एवं भारत में विकास पर कुपोषण के प्रभाव का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था कि कुपोषण से बालको का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। वायु एवं प्रकाश

 

 

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ वायु की आवश्यकता होती है, अगर जादु स्वच्छ न मिले तो बालक बीमार हो सकता है एवं इनके अभाव में कार्य करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। शारीरिक विकास के लिए सूर्य के प्रकाश की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि सूर्य के प्रकाश में विटामिन-डी की प्राप्ति होती है, जो विकास के लिए अपरिहार्य है।

 

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