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विकास की अवधारणा बाल-विकास - Concept of development and growth In Hindi MPTET,UPTET All Topics In Hindi.

 विकास की अवधारणा बाल-विकास - Concept of development and growth In Hindi MPTET,UPTET All Topics In Hindi.

विकास की अवधारणा बाल-विकास - Concept of development and growth In Hindi MPTET,UPTET All Topics In Hindi.


1.

विकास की अवधारणा - Concept of development

2.

बाल विकास का क्या तात्पर्य है  What does child development mean

3.

बाल विकास का अध्ययन में निम्नलिखित बातों को शामिल किया जाता है - The following points are included in the study of child development

4.

विकास की प्रक्रिया में मानव विकास की अवस्थाएँ - Stages of human development in the process of development

5.

शैशावावस्था - Childhood

6.

बाल्यावस्था – Childhood

7.

किशोरावस्था – Adolescence

8.

विकास को प्रभावित करने वाले कारक - Factors affecting growth

9.

विकास के विभिन्न आयाम - Different dimensions of development

10.

शारीरिक विकास - physical development

11.

मानसिक विकास - Mental growth

12.

संज्ञानात्मक विकास - Cognitive Development

13.

भाषायी विकास - Linguistic Development

14.

सामाजिक विकास - Social Development

15.

सांवेगिक विकास - Emotional Development

16.

मनोगत्यात्मक विकास - Psychological Development

17.

क्रियात्मक विकास - Functional Development


विकास की अवधारणा - Concept of development

मानव में विकास सतत् चलने वाली एक विकासात्मक प्रक्रिया है विकास की अवधारणा विकास की प्रक्रिया एक अविरल, क्रमिक तथा सतत् प्रक्रिया होती है। विकास की इस प्रक्रिया में बालक का कई प्रकार से विकास होता है जिसमे शारीरिक, क्रियात्मक, संज्ञानात्मक, भाषागत, संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास होता है। विकास की प्रक्रिया में रुचियों, आदतों, दृष्टिकोणों, जीवन-मूल्यों, स्वभाव, व्यक्तित्व, व्यवहार इत्यादि का विकास भी शामिल है। मानव का विकास जन्म से पूर्व गर्भ में ही आरम्भ हो जाता है |


बाल विकास का क्या तात्पर्य है  What does child development mean

बच्चों में होने वाला विकास गर्भ में ही आरम्भ हो जाता है जिसमे वह अलग-अलग अवस्थाओं से गुजरता है| विकास की इस प्रक्रिया में बालक गर्भावस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था कई अवस्थाओं से गुजरते हुए परिपक्वता की स्थिति को प्राप्त करता है। अलग-अलग आयु में बालक में अलग-अलग प्रकार से विकास की प्रक्रिया होती है और बालक पूर्ण विकसित हो कर परिपक्वता को प्राप्त करता है |

 


बाल विकास का अध्ययन में निम्नलिखित बातों को शामिल किया जाता है - The following points are included in the study of child development

 

  1.         जन्म लेने से पूर्व एवं जन्म लेने के बाद परिपक्व होने तक बालक में किस प्रकार केपरिवर्तन होते हैं?
  2.          बालक में होने वाले परिवर्तनों का विशेष आयु के साथ क्या सम्बन्ध होता है?
  3.          आयु के साथ होने वाले परिवर्तनों का क्या स्वरूप होता है?
  4.          बालकों में होने वाले उपरोक्त परिवर्तनों के लिए कौन-से कारक जिम्मेदार होते हैं?
  5.         बालक में समय-समय पर होने वाले उपरोक्त परिवर्तन उसके व्यवहार को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं?
  6.          क्या पिछले परिवर्तनों के आधार पर बालक में भविष्य में होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तनों की भविष्यवाणी की जा सकती है?
  7.          क्या सभी बालकों में वृद्धि एवं विकास सम्बन्धी परिवर्तनों का स्वरूप एक जैसा होता है अथवा व्यक्तिगत विभिन्नता के अनुरूप इनमें अन्तर होता है?
  8.  
  9.          बालकों में पाए जाने वाले व्यक्तिगत विभिन्नताओं के लिए किस प्रकार के आनुवंशिक एवं परिवेशजन्य प्रभाव उत्तरदायी होते हैं?
  10.          बालक के गर्भ में आने के बाद निरन्तर प्रगति होती रहती है। इस प्रगति का विभिन्न आयु तथा अवस्था विशेष में क्या स्वरूप होता है?
  11.  
  12.          बालक की रुचियों, आदतों, दृष्टिकोणों, जीवन-मूल्यों, स्वभाव तथा उच्च व्यक्तित्व एवं व्यवहार-गुणों में जन्म के समय से ही जो निरन्तर परिवर्तन आते तथा रहते इस हैं उनका परिवर्तन विभिन्न की प्रक्रिया आयु वर्ग की तथा क्या अवस्था प्रकृति होती विशेष है में? क्या स्वरूप होता है |


विकास की प्रक्रिया में मानव विकास की अवस्थाएँ - Stages of human development in the process of development

 

मानव विकास एक सतत् प्रक्रिया है। शारीरिक विकास तो एक सीमा (परिपक्वता प्राप्त करने) के बाद रुक जाता है, किन्तु मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास निरन्तर होता रहता है। इन मनोशारीरिक क्रियाओं के अन्तर्गत मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास आते हैं। इनका विकास विभिन्न आयु स्तरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। मानव विकास में इन आयु स्तरों को मानव विकास की अवस्थाएँ कहा जाता हैं।

 

भारतीय मनीषियों ने विकास प्रक्रिया में मानव विकास की अवस्थाओं को सात कालों या अवस्थाओं में विभाजित किया है | जो निम्न है -

  1.          गर्भावस्था. गर्भाधान से जन्म तक।
  2.          शैशवावस्था जन्म से 5 वर्ष तक।
  3.          बाल्यावस्था 5 वर्ष से 12 वर्ष तक।
  4.          किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक।
  5.          युवावस्था 18 वर्ष से 25 वर्ष तक।
  6.          प्रौढ़ावस्था. 25 वर्ष से 55 वर्ष तक।
  7.         वृद्धावस्था 55 वर्ष से मृत्यु तक।

 

मगर इस समय मानव विकास का अध्ययन निम्नलिखित चार अवस्थाओं के किया जाता हैं-

·         शैशवावस्था जन्म से 6 वर्ष तक।

·         बाल्यावस्था 6 वर्ष से 12 वर्ष तक।

·         किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक।

·         वयस्कावस्था 18 वर्ष से मृत्यु तक।

शिक्षा और अध्ययन की दृष्टि से प्रथम तीन अवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण हैं, इसलिए शिक्षा मनोविज्ञान में इन्हीं तीन अवस्थाओं में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है।


शैशावावस्था - Childhood

बालक का विकास जन्म से आरम्भ होता है जिसमे वह अलग अलग अवस्थाओं से गुजरता है इसमें बालक जन्म से ले कर 6 वर्ष तक शैशवावस्था में होता वर्ष है। अवस्था शैशवावस्था बच्चों को का शारीरिक में शैशवावस्था अनुकरण एवं दोहराने की  तीन प्रवृत्ति बच्चों में पाई जाती है। इसी काल में बच्चों का समाजीकरण भी प्रारम्भ हो जाता है। इस काल में जिज्ञासा की तीव्र प्रवृत्ति बच्चों में पाई जाती है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से यह काल भाषा सीखने की सर्वोत्तम अवस्था है। इन्हीं सब कारणों से यह काल शिक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।


बाल्यावस्था - Childhood

शैशवावस्था  जन्म से आरम्भ हो कर 6 वर्ष तक की आयु की अवधि तक चलती है इसके बाद 6 वर्ष से 12 वर्ष तक की अवस्था में बालक प्रवेश करता है इस अवस्था को बाल्यावस्था कहा जाता है। बाल्यावस्था के प्रथम चरण 6 से 9 वर्ष में बालकों की लम्बाई एवं भार दोनों बढ़ते हैं। इस काल में बच्चों में चिन्तन एवं तर्क शक्तियों का विकास हो जाता है। इस काल के बाद से बच्चे पढ़ाई में रुचि लेने लगते हैं। शैशवावस्था में बच्चे जहाँ बहुत तीव्र गति से सीखते हैं वहीं बाल्यावस्था में सीखने की गति मन्द हो जाती है, किन्तु उनके सीखने का क्षेत्र शैशवावस्था की तुलना में विस्तृत हो जाता है। बाल्यावस्था में बालक को मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से शिक्षा देने के लिए अलग-अलग प्रकार की विधियों का प्रयोग करना चाहिए जो प्रायोगिक हो।


किशोरावस्था - Adolescence

बाल्यावस्था  12 वर्ष की आयु तक मणि गयी है जो 6 से 12 वर्ष की अवधि में पूर्ण हो जाती है इसके बाद 12 वर्ष से 18 वर्ष तक की अवस्था में बालक प्रवेश करता है इस अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है। यह वह समय होता है जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर उन्मुख होता है। इस अवस्था में किशोरों की लम्बाई एवं भार दोनों में वृद्धि होती है, साथ ही मांसपेशियों में भी वृद्धि होती है। 12-14 वर्ष की आयु के बीच लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की लम्बाई एवं मांसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की लम्बाई एवं मांसपेशियाँ तेजी से बढ़ती हैं। इस काल में प्रजनन अंग विकसित होने लगते हैं एवं उनकी काम की मूल प्रवृत्ति जागृत होती है। इस अवस्था में किशोर-किशोरियों की बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है, उनके ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है, स्मरण शक्ति बढ़ जाती है एवं उनमें स्थायित्व आने लगता है। इस अवस्था में बालक के अंदर मित्र बनाने की प्रवृत्ति तीव्र होती इस समय परिवार से बहार मित्र होना सामान्य-सी बात है।

 


विकास को प्रभावित करने वाले कारक - Factors affecting growth

विकास एक लगातार, सतत् तथा कभी ना रुकने वाली प्रक्रिया है। विकास से बच्चे में आए सभी परिमाणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों का संकेत मिलता है। यह जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। विकास पर माँ-बाप, घर का वातावरण, अड़ोस-पड़ोस, बाहर का वातावरण, सीखने, परिपक्वता तथा आनुवंशिक कारकों का भी बहुत प्रभाव पड़ता है। ये सभी करक बच्चे के विकास पर प्रत्यक्ष रूप से अपना असर डालते है और विकास को प्रभावित करते हैं।


विकास के विभिन्न आयाम - Different dimensions of development

बालक के विकास या बाल-विकास को वैसे तो कई आयामों में विभाजित किया जा सकता है,

मगर बाल-विकास एवं बाल-मनोविज्ञान के अध्ययन के दृष्टिकोण से इसके निम्न महत्त्वपूर्ण आयाम होते हैं|


शारीरिक विकास - physical development

  1. विकास की इस प्रक्रिया के अन्तर्गत बालक के शरीर के बाह्य एवं आन्तरिक अवयवों का विकास शामिल होता है। विकास की इस प्रक्रिया में शरीर के बाह्य परिवर्तन जैसे-ऊँचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके साथ ही शरीर में आन्तरिक अवयवों का विकास भी होता है मगर यह परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर के अन्दर इनका समुचित विकास चलता रहता है। और बालक का शारीरिक विकास होता रहता है|
  2. शारीरिक वृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया व्यक्तित्व के उचित समायोजन और विकास के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब बालक छोटा होता तो प्रारम्भ में अपने हर प्रकार के कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, मगर धीरे-धीरे विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होता जाता है। और अपने कार्य स्वयं करने लगता है |
  3. अगर किसी कारण से शारीरिक वृद्धि एवं विकास में असमान्यता दिख रही है तो उस पर बालक के आनुवंशिक गुणों का प्रभाव हो सकता है। आनुवंशिक गुणों के कारण बालक का शारीरिक विकास प्रभावित हो सका है इसके अतिरिक्त बालक के परिवेश एवं उसकी देखभाल का भी शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर प्रभाव पड़ता है। बालक जैसे परिवेश में रहता है उसी प्रकार से उसका विकास होता है |


मानसिक विकास - Mental growth

 

  1. बालक में मानसिक विकास का मतलब होता है उसके दिमाग का विकास इस बात से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है जिसके परिणामस्वरूप वह अपने निरन्तर बदलते हुए वातावरण में रहने लायक समायोजन करता है अगर उसको किसी प्रकार की समस्याओं का सामना करना पढ़े तो वह उनको खुद को सुलझाने में सक्षम हो इसके लिए वह अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है। इसी को मानसिक विकास कहा जाता है |
  2. इस प्रक्रिया में कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, समस्या समाधान करना, निर्णय लेना, इत्यादि की योग्यता संज्ञानात्मक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं। जब शिशु जन्म लेता है तो उसके अन्दर इस प्रकार की योग्यता नही होतीं है, मगर जैसे-जैसे बालक की आयु बढती है तो धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है और उसके अन्दर सोचने-समझने की शक्ति का विकास होता है।

 

 

 


संज्ञानात्मक विकास - Cognitive Development

अगर आप बालकों को पढ़ा रहे है तो आपको संज्ञानात्मक विकास की पर्याप्त जानकारी होना आवश्यक है, क्योंकि इसके अभाव में वह बालकों की इससे सम्बन्धित समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएगा। अगर कोई बच्चा मानसिक रूप से कमजोर है, तो इसके क्या कारण है, यह जानना उसके उपचार के लिए आवश्यक है। और आप ऐसा तभी कर सकते जब आपको संज्ञानात्मक विकास के बारे में पर्याप्त जानकारी हो|  संज्ञानात्मक विकास के बारे में पर्याप्त जानकारी होने से विभिन्न आयु स्तरों पर पाठ्यक्रम, सहगामी क्रियाओं तथा अनुभवों के चयन और नियोजन में सहायता मिलती है। किस विधि और तरीके से पढ़ाया जाए, सहायक सामग्री तथा शिक्षण साधन का प्रयोग किस तरह किया जाए, शैक्षणिक वातावरण किस प्रकार का हो, इन सबके निर्धारण में संज्ञानात्मक विकास के विभिन्न पहलुओं की जानकारी शिक्षकों के लिए सहायक साबित होती है।


भाषायी विकास - Linguistic Development

भाषा ही एक माध्यम है जीके द्वारा हम अपनी बातों को एक दूसरे के साथ आदान-प्रदान कर सकते है भाषा का विकास एक प्रकार का संज्ञानात्मक विकास योग्यता की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भाषा का तात्पर्य होता है वह सांकेतिक साधन, जिसके माध्यम से बालक अपने विचारों एवं भावों का सम्प्रेषण करता है तथा दूसरों के विचारों एवं भावों को समझता है। भाषायी योग्यता के अन्तर्गत मौखिक अभिव्यक्ति, सांकेतिक अभिव्यक्ति, लिखित अभिव्यक्ति शामिल हैं। हम कह सकते है की बालक के अन्दर भाषा को समझने की शक्ति या भाषायी योग्यता एक कौशल है, और इस कौशल को बालक अपने परिवेश से अर्जित करता है। भाषायी कौशल को प्राप्त करने की प्रक्रिया बालक के जन्म से ही प्रारम्भ हो जाती है। अनुकरण, वातावरण के साथ अनुक्रिया तथा शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की माँग इसमें विशेष भूमिका निभाती है। यह विकास बालक में धीरे-धीरे एक निश्चित क्रम में होता है। जब बालक जन्म लेता है तब से ले कर लेकर आठ महीने तक बालक को किसी शब्द की जानकारी नहीं होती। जैसे-जैसे बालक की आयु में बदलाव आता है उसी प्रकार अलग अलग आयु वर्ग में बालक अलग अलग शब्दों का ज्ञान प्राप्त करता है  9 माह से 12 माह के बीच बालक को तीन या चार शब्दों का ज्ञान हो जाता है और वह उनको समझने लगता है। जब बालक डेढ़ वर्ष की आयु पूर्ण कर लेता है तो उसे 10 से 12 शब्दों की जानकारी हो जाती है |

 

 

2 वर्ष की आयु तक उसे दो सौ से अधिक शब्दों की जानकारी हो जाती है। 9 वर्ग के भीतर ही बालक लगभग एक हजार शब्दों को समझने लगता है। इसी तरह उसमें भापायी विकास होते रहते हैं और 16 वर्ष की आयु तक वाल लगभग एक लाख शब्दों को समझने की योग्यता विकसित कर लेता है।

 

भाषायी विकास को प्रक्रिया में लिखने एवं पड़ने का भी जान उसमें धीरे-धीरे ही होता है। बाल्यावस्था में वह धीरे-धीरे एक एक शब्द को पढ़ता एवं लिखता है, उसके बाद उसके इन कौशलों में गति आती जाती है।

 

शिक्षकों को भाषा के विकास की प्रक्रिया का सही ज्ञान होना इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि इसी के आधार पर बालक की भाषा से सम्बन्धित समस्याएं जैसे-अस्पष्टउच्चारण, गलत उच्चारण, तुतलाना, हकलाना, तीव्र अस्पष्ट वाणी इत्यादि का समाधान कर सके |


सामाजिक विकास - Social Development

·         मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। बालक में सामाजिक भावनाओं का विकास जन्म के बाद ही शुरू होता है। वृद्धि एवं विकास के अन्य पहलुओं की तरह ही सागाणिक गुण भी बच्चे में धीरे धीरे पनपते है। इन गुणों के विकास की प्रक्रिया, जो बच्चे के सामाजिक व्यवहार में वाछनीय परिवर्तन लाने का कार्य सम्पन्न करती है, सामाजिक विकास अथवा समाजीकरण के नाम से जानी जाती है।

 

·         सामाजिक वृद्धि एवं विकास का अर्थ होता है अपने साथ एवं दूसरों के साथ भली-भांति समायोजन करने की योग्यता हर एक बालक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक विकास की प्रक्रिया बालक को जो हमारे समाज की सामाजिक मान्यताए है, जो हमारे समाज के रीति-रिवाज है और साथ-साथ परम्पराओं के आचरण करने में उनको सिखाने में सहायता करती है और यह सब जानने और सिखने के बाद ही एक बालक इस तरह से अपने माजिक परिवेश में ठीक प्रकार से समायोजित हो कर रह पता है सामाजिक विकास ही उसको इस काबिल बनता है की वह अपने समाज को समझ सके और और अपनी जगह बना सके।

·         शारीरिक ढाँचा, स्वास्थ्य, बुद्धि, संवेगात्मक विकास, परिवार, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक वातावरण, इत्यादि व्यक्ति के सामाजिक विकास को प्रभावित करते है। शिक्षा के कई उद्देश्यों में एक बालक का सामाजिक विकास भी होता है।

 


सांवेगिक विकास - Emotional Development

  1.          संवेग जिसे हम सामान्यत भाव भी कहते है  इसका का अर्थ होता है ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है। हमारे अन्दर भाव भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, विषाद, यह सब हमारे भाव है और यही संवेग के उदाहरण भी हैं। जैसे-जैसे बालक की आयु बढ़ने लगती है उसी के साथ ही बालक के अन्दर इन संवेगों का विकास समय के साथ होता रहता है।
     
  2.         संवेगात्मक विकास मानय वृद्धि एवं विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। व्यक्ति का संवेगात्मक व्यवहार उसके शारीरिक पृद्धि एवं विकास को ही प्रभावित नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है। प्रत्येक संवेगामक अनुभूति व्यक्ति में कई प्रकार के शारीरिक और शरीर सम्बन्धी परिवर्तनों को जन्म देती है।
     
  3.          संवेगात्मक विकास के दृष्टिकोण से चालक के स्वास्था एवं शारीरिक विकास पर पूरा पूरा ध्यान देने की आवश्यकता पड़ती है। चालक के संवेगात्मक विकास पर पारिवारिक वातावरण भी बहुत प्रभाव डालता है। विद्यालय के परिवेश और मिया-कलापों को उचित प्रकार से संगठित कर अध्यापक बच्चों के संवेगात्मक विकास में भरपूर योगदान दे सकते हैं। बालकों को शिक्षकों का पर्याप्त सहयोग एवं स्नेह मिलना उनके व्यक्तित्व के विकास के दृष्टिकोण से आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बालक के स्वाभिमान को कभी लेस न पहुंचे। इस तरह संवेगात्मक विकास के कई पहलुओं को ध्यान में रखकर हो बालक का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।


मनोगत्यात्मक विकास - Psychological Development

  1.    क्रियात्मक विकास का अर्थ होता है- व्यक्ति को क्रियात्मक शक्तियों, क्षमताओ या योग्यताओं का विकास। क्रियात्मक शक्तियाँ, क्षमताएँ या योग्यताओं का अर्थ होता है ऐसी शारीरिक गतिविधियों या क्रियाएँ जिनको सम्पन्न करने के लिए मासपेशियों एवं तन्त्रिकाओं की गतिविधियों के संयोजन को आवश्यकता होती है। जैसे-चलना, भैठना, इत्पादि। एक नवजात शिशु ऐसे कार्य करने में अक्षम होता हैं |

  2.         शारीरिक वृद्धि एवं विकास के साथ ही उम्र बढ़ने के साथ उसमें इस तरह की योग्यताओं का भी विकास होने लगता है। क्रियात्मक विकास बालक के शारीरिक विकास, स्वस्थ रहने, स्वावलम्बी होने एवं उचित मानसिक विकास में सहायक होता है। इसके कारण बालक को आत्मविश्वास आर्जत करने में भी सहायता मिलती है। अगर किसी बालक के अन्दर पर्याप्त क्रियात्मक नही है तो इसके आभाव में बालक में विभिन्न प्रकार के कौशलों को सीख नही पाता है।


क्रियात्मक विकास - Functional Development

  1.          क्रियात्मक विकास का ज्ञान शिक्षक के लिए आवश्यक है अगर आप बालक के अन्दर अलग अलग प्रकार के कौशल विकसित करना चाहते है तो आप इसी ज्ञान के आधार पर ही वह बालक में विभिन्न कौशलों का विकास कर सकते है।

  2.          अगर आपको क्रियात्मक विकास का ज्ञान है तो इस ज्ञान के आधार पर ही आपको यह भी पता चलता है कि किस आयु में या अवस्था में बालक किस प्रकार के कौशल सीख सकता है। अगर किसी बालक में क्रियात्मक विकास सामान्य रूप से से कम होता है, तो उसके लिए शिक्षक को समायोजन एवं विकास हेतु विशेष प्रकार से कार्य करने की आवश्यकता होती है। और आप उसके अन्दर कौशालों का विकास कर सकते है |

 

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