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रस – परिभाषा, प्रकार और उदाहरण – Ras Kya Hai Prakar Aur Udahran (Ras In Hindi)

रस – परिभाषा, प्रकार और उदाहरण – Ras Kya Hai Prakar Aur Udahran (Ras In Hindi)


रस परिभाषा, प्रकार और उदाहरण – Ras Kya Hai Prakar Aur Udahran (Ras In Hindi) 

 

रस की परिभाषा :

हिंदी व्याकरण में रस को काव्य की आत्मा माना गया है, रस शब्द का अर्थ आनन्द है जब हम किसी काव्य को पढ़ते या सुनते है उस समय हमारे मन को जिस आनन्द की अनुभूति होती है उसे रस कहा जाता है|

रीतिकाल के आचार्य चिंतामणि लिखते हैजो सुन पड़े सो शब्द है, समुझि परे सो अर्थइस पंक्ति का अर्थ है जो सुनाई पड़े वो शब्द है, और जो समझ आये वो उस शब्दका अर्थ है | जिस प्रकार मिठाई का नाम सुनते ही हमारे मुहं में पानी भर आता है | सांप या भूत का नाम सुन कर मन में भय उत्पन्न हो जाता है यहाँ शब्द सुन कर उसका अर्थ हमारे मन में उस भाव का संचार कर देता है |

रस के अंग

रस के 4 अंग या अवयव होते हैं| जो निम्न हैं

  1. विभाव
  2. अनुभाव
  3. संचारी भाव
  4. स्थायीभाव

1.    विभाव क्या है? : 

वह कारण जो मन के भावों को जागृत करता है, उसे विभाव कहा जाता है | इसको पुनः दो भागों में रखा गया है, जो निम्न है

  1. आलंबन विभाव
  2. उद्दीपन विभाव

विभाव के प्रकार :

  • ·         आलंबन विभाव : 

वह आलंबन जिसके द्वारा या जिसका सहारा पाकर स्थायी भाव का जागरण होता है उसे आलंबन विभाव कहलाता है |

आलंबन विभाव के दो प्रकार होते है अश्रयालंबन और विषयालंबन

अश्रयालंबन जिसके मन में भाव जाग रहे है अश्रयालंबन कहा जाता है |

विषयालंबनजिसके लिए या जिसके प्रति मन में भाव जाग रहे उसे विषयालंबन विभाव कहा जाता है |

  • ·         उद्दीपन विभाव : 

जिस कारण से या किसी वस्तु को देख कर जो भाव मन में जागृत होते है उन्हें उद्दीपन विभाव कहा जाता है |

2.   अनुभाव क्या है ? : 

जिस भाव को व्यक्त करने के लिए हमारे शरीर में उत्पन्न विकार अनुभाव कहलाते है | अर्थात जिस भाव का संकेत हम बोल कर या शारीरिक प्रतिक्रिया के द्वारा दर्शाते है उसे अनुभाव कहा जाता है |

इनकी संख्या आठ मानी गयी है जो निम्न है -  

  1. स्तंभ,
  2. स्वेद,
  3. रोमांच,
  4. स्वर-भंग,
  5. कम्प,
  6. विवर्णता (रंगहीनता),
  7. अश्रु,
  8. प्रलय (संज्ञाहीनता),

3.  संचारी भाव या व्यभिचारी भाव क्या है ? : 

ऐसे भाव जिनका मन में संचरण होता है या मन में संचरण (मन में आने-जाने वाले) होता है उनको संचारी भाव या व्यभिचारी भाव कहा जाता है |

संचारी भाव या व्यभिचारी भाव के प्रकार :

संचारी भाव या व्यभिचारी भाव की संख्या 33 होती है

  1. हर्ष
  2. विषाद
  3. त्रास
  4. लज्जा
  5. ग्लानी
  6. चिंता
  7. शंका
  8. असूया (अर्थ - दुसरे के उत्कर्ष के प्रति असहिष्णुता)
  9. अमर्ष,  
  10. मोह
  11. गर्व,
  12. उत्सुकता,
  13. उग्रता,  
  14. चपलता
  15. दीनता,
  16. जड़ता,
  17. आवेग,
  18. निर्वेद,
  19. धृति (इच्छाओं की पूर्ति),
  20. मति,
  21. बिबोध,
  22. वितर्क,
  23. श्रम,
  24. आलस्य,
  25. निद्र,
  26. स्वप्न,
  27. स्मृति,
  28. मद,
  29. उन्माद,
  30. अवहिथ्ता(हर्ष या अन्य भावों को छिपाना),
  31. अपस्मार,
  32. व्याधि (रोग),
  33. मरण,

4. रस का स्थायी भाव

स्थायी भाव को ही रस का आधार माना जाता है | यह रस का प्रधान भाव है और यह भाव रस की अवस्था तक जा सकता है | किसी भी काव्य नाटक में आरम्भ से लेकर अंत तक स्थायी भाव ही होता है इनकी संख्या 9 मानी गयी है और इनको नवरस कहा जाता है |

मूलतः हिन्दी व्याकरण में यही नव रसों को माना जाता है मगर इसके अलावा दो और रस वात्सल्य रस और भक्ति रस को शामिल किया गया है इस प्रकार रस की संख्या 11 हो जाती है |

  1. श्रृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. करुण रस
  4. वीर रस
  5. अदभुत रस
  6. भयानक रस
  7. रौद्र रस
  8. वीभत्स रस
  9. शांत रस
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस

 

श्रृंगार रस : 

जब मन में उपस्थित रति या प्रेम रस की अवस्था को प्राप्त करता है श्रृंगार रस

कहलाता है | श्रृंगार रस को रसपति या रसराज कहा जाता है | इसका स्थायी भाव रति/प्रेम है

example : बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय |

            सौंह करे, भौंहनि हँसे, दैन कहै, नटि

हास्य रस :  

जब किसी प्रकार के विकार या वेशभूषा, वाणी आदि को देख मन में जो खुशी/प्रशन्नता उत्पन्न होती है उसे हास्य रस कहा जाता है | हास्य रस का स्थायी भाव हास है |

example : घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,

           धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता |

करुण रस : 

जब किसी के दूर चले जाने से, किसी अपने के वियोग से, अपने प्रेमी से विछुड़ जाने के कारण मन में जो दुःख रुपी वेदना होती है, उसे करुण रस कहा जाता है | इसका स्थायी भाव शोक होता है |

example : करहिं विलाप अनेक प्रकारा |

            परिहिं भूमि ताल बारहिं बारा ||

वीर रस : 

जब किसी कारण से मन में कोई कठिन कार्य करने का उत्साह जागृत होता है या जब हम कोई कठिन कार्य वीर की भांति करते है, तो उस समय उत्पन्न रस को वीर रस कहा जाता है | वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है |

example : वीरत तुम बढे चलो, धीर तुम बड़े चलो |

            सामने पहाड़ हो या सिंह की दहाड़ हो |

            तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नही ||

अद्भुत रस : 

जब किसी हम किसी वस्तु को देख आश्चर्य में हो जाते है या जब उसको देख कर हमारे मन में विस्मय का भाव उत्पन्न होता है, तो वह अद्भुत रस कहलाता है | इसका स्थायी भाव आश्चर्य होता है |

example :   अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।

चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥

भयानक रस : 

किसी दुःखद घटना को देखने सुनने या वर्णन करने से मन में जो व्याकुलता या परेशानी उत्पन्न होती है उसे भय कहा जाता है और इसी भय से उत्पन्न रस भयानक रस कहलाता है | इसका स्थायी भाव भय है |

example : उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी |

            चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों-सी ||

रौद्र रस : 

जब किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी की निंदा करने से उसके मन में जो क्रोध उत्पन्न होता है, उसे रौद्र रस कहा जाता है | इसका स्थायी भाव क्रोध होता है |

example : संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े |

        करते हुए घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े ||

 

वीभत्स रस : 

जब किसी व्यक्ति को देख कर हमारे मन में उसके प्रति घृणा उत्पन्न होती है और इस घृणा से उत्पन्न रस वीभत्स रस कहलाता है | इसका स्थायी भाव घृणा/जुगुप्सा है |

 

शांत रस : 

जब हमें तत्व ज्ञान प्राप्त होता है या संसार के वैराग्य होने पर जो शांति मिलती है जहाँ ना तो दुःख होता और ना ही द्वेष होता है, उस रस को शांत रस कहा जाता है | इसका स्थायी भाव शम/निर्वेद (वैराग्य/वीतराग) है |

example : मन रे तन कागद का पुतला |

      लागै बूंद बिनिस जाय छिन में, गरब करै क्या इतना ||

वात्सल्य रस : 

जो प्रेम बच्चों के लिए बड़ों का होता है, जो प्रेम शिष्यों के लिए गुरु का होता है, माता का जो प्रेम पुत्र के लिए होता है यह भाव स्नेह कहलाता है, और यही स्नेह वात्सल्य रस कहलाता है इसका स्थायी भाव वात्सल्य रति होता है |

example : बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि पुनि नन्द बुलवाती

            अंचरा-तर लै ढाकी सूर, प्रभू को दूध पियावति

भक्ति रस : 

हमारे मन में ईश्वर के प्रति जो प्रेम होता है उसका वर्णन करने से जो रस उत्पन्न होता है उसे भक्ति रस कहा जाता है | इसका स्थायी भाव रति/अनुराग होता है

example : राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे |

        घोर भव नीर-निधि, नाम निज नाव रे ||

  

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